Friday, 15 August 2025

आजादी की अनुभूति'



*विधा-गीत*


*शीर्षक- "आज़ादी की अनुभूति"*


सुनहरी सुबह का सपना, अभी अधूरा-सा क्यों है?

धरती तो अपनी हो गई, मन पर पहरा क्यों है?

भीड़ है राहों में फिर भी, दिल अकेला रोता है,

आज़ादी की अनुभूति, अब भी कहीं खोता है…॥


मुट्ठी में इतिहास थामे, चल दिए हम दूर तक,

पर सपनों के गांव में, पहुंचे ही नहीं आज तक।

रोटी के संग सम्मान का, स्वाद कब हम पाएंगे?

सच्ची आज़ादी के सूरज, कब नभ में छाएंगे…?॥


जाति-धर्म की दीवारें, क्यों अभी भी ऊँची हैं?

अंधी दौड़ में नैतिकता, क्यों पीछे छूटी है?

शब्द तो आज़ाद हैं लेकिन, सोच कैदखानों में,

सपनों के दीपक जलते हैं, आंसू के ठिकानों में…॥


फिर भी उम्मीद का पंछी, उड़े न थकने पाएगा,

हर पीढ़ी एक नया सवेरा, आकाश में लाएगा।

पर सवाल मन में गूंजे, जैसे कोई तान पूरा—

आज़ादी की अनुभूति, होगी कब सच में पूरा…?॥


©गुरुदास प्रजापति 'राज़'

भारतीय स्वाधीनता- मंजिल अब भी दूर है?


विधा - *संवाद* (नाटकीय झलक लिए)


*शीर्षक: भारतीय स्वाधीनता– मंज़िल अब भी दूर?*

लेखक: आचार्य गुरुदास प्रजापति


दृश्य:


पार्क में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव चल रहा है। मंच के एक ओर तिरंगा फहरा रहा है, बच्चों का झुंड देशभक्ति गीत गा रहा है – “सारे जहाँ से अच्छा…”।

एक तरफ बेंच रखी है। पूनम, रेशम और प्रतिभा वहाँ आती हैं, हाथ में तिरंगे और चाय के कप।


[प्रवेश]

(पूनम तिरंगे की ओर देख रही है, आवाज़ में गर्व और सवाल दोनों)


पूनम:

"79वाँ स्वतंत्रता दिवस… देखो रेशम, कितनी रौनक है। बच्चे, झंडे, गीत… लेकिन दिल में एक सवाल है—क्या हमारा गणतंत्र वाकई अपने उद्देश्यों में सफल हुआ है?"


रेशम:

"पूनम, यही तो बात है। हमने 1950 में सोचा था—‘गवर्नमेंट ऑफ द पीपल, बाय द पीपल, फॉर द पीपल’। लेकिन आज… ‘for the people’ शब्द कहीं खो गए हैं। हाँ, विकास हुआ है, मगर जहाँ हमें पहुँचना चाहिए था… हम वहाँ नहीं हैं।"


प्रतिभा (थोड़ा तीखे स्वर में):

"सिर्फ नहीं पहुँचे, कई मामलों में पीछे भी हैं। हमारे साथ इज़राइल बना, चारों तरफ से दुश्मन घिरे होने के बावजूद वो शान से खड़ा है। चीन, जो 1949 में नया शासन लाया, अब सुपरपावर बन चुका है। और पाकिस्तान… वो भी कई बार हमसे ज़ोर से अपनी बात रख देता है।"


पूनम:

"हमारी सबसे बड़ी गलती—हमने देश को देश की तरह नहीं देखा। राजनीति संकीर्ण हो गई। हर मुद्दा वोट बैंक से तौला जाने लगा। पूरे समाज के चश्मे से देखने के बजाय 'माइनॉरिटी बनाम मेजॉरिटी' की खिड़की से देखना शुरू किया।"


रेशम:

"और यही कारण है कि 75 साल बाद भी कोई ठोस राष्ट्र नीति नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट नीति तक नहीं। हाल ही में, कश्मीर में फिर से सीमा पार से घुसपैठ की खबर आई, और हम फिर पुराने तरीक़े से ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं।"


प्रतिभा:

"लोकतंत्र के चारों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया—सबकी स्थिति देख लो। न्याय में देरी, संविधान के आदर्शों का क्षरण, आर्थिक विषमता… और ऊपर से भ्रष्टाचार का मकड़जाल। चुनाव में सुधार की बातें होती हैं, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं।"


पूनम:

"और महिलाएँ? देश की आधी आबादी, लेकिन अब भी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। पिछले महीने जो महिला सुरक्षा बिल की चर्चा थी, वो फिर ठंडे बस्ते में चली गई। न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी कि पीड़िता को थक जाना पड़ता है।"


रेशम:

"सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, हमारी युवा पीढ़ी भी। उन्हें राजनीतिक चेतना देने के बजाय, सोशल मीडिया की झूठी चमक-दमक में डुबो दिया गया है। टिकटॉक बैन हुआ तो दूसरे ऐप आ गए, पर असली सवाल—देश के लिए सोचने की आदत—कहाँ है?"


प्रतिभा (दृढ़ आवाज़ में):

"तो हमें करना क्या होगा? हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी पर भाषण सुनकर घर लौट जाएँ? नहीं। अब राजनीति से ऊपर उठकर कुछ स्थायी राष्ट्रीय नीतियाँ बनानी होंगी—विदेश नीति, सुरक्षा नीति, आर्थिक नीति… और सबसे अहम—एक देश, एक सोच।"


पूनम:

"महिला और युवा शक्ति को भी निर्णय लेने में पूरा अवसर देना होगा। अपराध होने पर तुरंत न्याय, और शिक्षा में संस्कारों का समावेश—जिसे आज सांप्रदायिक कहकर दरकिनार किया जाता है।"


रेशम:

"सोच बदलनी होगी। क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनता है। और जब सोच में राष्ट्रप्रेम होगा, तभी गणतंत्र अपने असली अर्थ में सफल होगा।"


[पृष्ठभूमि में बच्चे ‘जन गण मन’ गाना शुरू करते हैं]


प्रतिभा (तिरंगे की ओर देखते हुए, भावुक होकर):

"चाहे करता कोई कितनी निंदा रहे,

चाहे मुक्त हर एक परिंदा रहे।

हम रहें या न रहें फर्क कुछ भी नहीं,

हमारा भारत हमेशा ही जिंदा रहे…"


     तीनों (एक साथ, हाथ में तिरंगा उठाकर):

"हमारा भारत हमेशा ही जिंदा रहे!"


(तिरंगा हवा में लहराता है, बच्चे गीत पूरा करते हैं, और...)


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स्वतंत्रता का सही अर्थ

 *स्वतंत्रता का सही अर्थ*


     भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली—यह तिथि इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है। किंतु क्या वास्तव में यही स्वतंत्रता का सही अर्थ है? या यह केवल एक राजनैतिक परिवर्तन था, जिसमें शासक अंग्रेज से भारतीय बन गए, पर व्यवस्था, सोच, और उद्देश्यों में कोई बुनियादी बदलाव न आया? जब हम "स्वतंत्रता" शब्द का अर्थ समझने का प्रयास करते हैं, तो पाते हैं कि यह केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि भीतर की जड़ताओं, भय, और असमानताओं से छुटकारा भी है। यदि ये जड़ताएँ बनी रहें, तो स्वतंत्रता केवल आधी, अधूरी और लक्ष्यहीन रह जाती है।


     भारत की आज़ादी का अर्थ था—गरीबी का अंत, अशिक्षा का उन्मूलन, जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव की समाप्ति, और हर नागरिक को समान अवसर। परंतु वास्तविकता यह है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राजनीति में भ्रष्टाचार, प्रशासन में अकुशलता और समाज में व्याप्त असमानता यह सिद्ध करती है कि स्वतंत्रता का लक्ष्य अधूरा है। हम राजनीतिक रूप से तो आज़ाद हैं, पर आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से अभी भी बंधन में जकड़े हैं।


     स्वतंत्रता के बाद किसी राष्ट्र के पास स्पष्ट और दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए—जैसे, शिक्षा में आत्मनिर्भरता, विज्ञान और तकनीक में अग्रणी बनना, या एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना। दुर्भाग्यवश, भारत की स्वतंत्रता के बाद की यात्रा में ऐसा कोई ठोस, सर्वमान्य और स्थिर लक्ष्य नहीं दिखाई देता। शासन बदलते ही नीतियाँ बदल जाती हैं, योजनाएँ अधूरी रह जाती हैं, और देश की ऊर्जा दिशा-हीन हो जाती है। परिणामस्वरूप, स्वतंत्रता का उत्सव तो मनाया जाता है, पर इसकी सार्थकता का निर्माण नहीं हो पाता।


     आज का राजनीतिक परिदृश्य यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता का उपयोग राष्ट्रीय उत्थान की बजाय राजनीतिक स्वार्थ साधने में अधिक हुआ है। चुनावी रैलियों में विकास के बजाय जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण पर जोर दिया जाता है। जनता को जागरूक नागरिक बनाने के बजाय उन्हें वोट बैंक के रूप में देखा जाता है। यदि स्वतंत्रता का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित रह जाए, तो वह अपने मर्म को खो देती है।


    सच्ची स्वतंत्रता केवल राजनीतिक ढांचे में बदलाव से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब हर व्यक्ति अपने भय, अज्ञान और अन्याय से मुक्त हो। यह स्वतंत्रता तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें और उनका पालन करें। यदि हम केवल अधिकारों की मांग करें और कर्तव्यों को भूल जाएं, तो स्वतंत्रता का संतुलन बिगड़ जाता है।


     महात्मा गांधी ने कहा था— "स्वतंत्रता बाहरी नहीं, आंतरिक भी होनी चाहिए।" जब तक व्यक्ति लोभ, क्रोध, घृणा और स्वार्थ की जंजीरों में जकड़ा रहेगा, तब तक राष्ट्र भी इन अदृश्य बंधनों से मुक्त नहीं हो पाएगा। दुर्भाग्य यह है कि आज हमारा समाज उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में उलझा है, जहां नैतिकता और मानवीयता पीछे छूट गई हैं।


      फिर भी, आशा की किरण मौजूद है। भारत के पास विशाल युवा शक्ति, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और असीम प्राकृतिक संसाधन हैं। यदि हम शिक्षा को प्राथमिकता दें, विज्ञान और तकनीक में निवेश करें, तथा ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाएं, तो हम न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से भी स्वतंत्र हो सकते हैं। यह तभी संभव है जब हम स्वतंत्रता को केवल ‘स्वतंत्र होने’ के रूप में न देखें, बल्कि इसे ‘सार्थक बनाने’ का प्रयास करें। हमारी हमेशा यही कामना रहती है - 

*रहो खुश मेरे हिंदुस्तान*

          *तुम्हारा पथ हो मंगल मूल*

*सदा महके बन चंदन चारु*

          *तुम्हारी अंगनाई की धूल*


*निष्कर्ष*

     स्वतंत्रता का सही अर्थ केवल यह नहीं कि हमारे ऊपर कोई विदेशी शासन न हो, बल्कि यह है कि हर नागरिक गरिमा, समानता और अवसर के साथ जीवन जी सके। आज, जब हम स्वतंत्रता का जश्न मनाते हैं, तो यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमारी स्वतंत्रता सचमुच पूर्ण है? क्या हमने इसका सही अर्थ समझ लिया है, या हम अब भी उसकी खोज में हैं…?


-  *गुरुदास प्रजापति 'राज'* ©

प्रख्यात लेखक एवं विशेषज्ञ