Friday, 15 August 2025

आजादी की अनुभूति'



*विधा-गीत*


*शीर्षक- "आज़ादी की अनुभूति"*


सुनहरी सुबह का सपना, अभी अधूरा-सा क्यों है?

धरती तो अपनी हो गई, मन पर पहरा क्यों है?

भीड़ है राहों में फिर भी, दिल अकेला रोता है,

आज़ादी की अनुभूति, अब भी कहीं खोता है…॥


मुट्ठी में इतिहास थामे, चल दिए हम दूर तक,

पर सपनों के गांव में, पहुंचे ही नहीं आज तक।

रोटी के संग सम्मान का, स्वाद कब हम पाएंगे?

सच्ची आज़ादी के सूरज, कब नभ में छाएंगे…?॥


जाति-धर्म की दीवारें, क्यों अभी भी ऊँची हैं?

अंधी दौड़ में नैतिकता, क्यों पीछे छूटी है?

शब्द तो आज़ाद हैं लेकिन, सोच कैदखानों में,

सपनों के दीपक जलते हैं, आंसू के ठिकानों में…॥


फिर भी उम्मीद का पंछी, उड़े न थकने पाएगा,

हर पीढ़ी एक नया सवेरा, आकाश में लाएगा।

पर सवाल मन में गूंजे, जैसे कोई तान पूरा—

आज़ादी की अनुभूति, होगी कब सच में पूरा…?॥


©गुरुदास प्रजापति 'राज़'

No comments:

Post a Comment