Friday, 15 August 2025

भारतीय स्वाधीनता- मंजिल अब भी दूर है?


विधा - *संवाद* (नाटकीय झलक लिए)


*शीर्षक: भारतीय स्वाधीनता– मंज़िल अब भी दूर?*

लेखक: आचार्य गुरुदास प्रजापति


दृश्य:


पार्क में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव चल रहा है। मंच के एक ओर तिरंगा फहरा रहा है, बच्चों का झुंड देशभक्ति गीत गा रहा है – “सारे जहाँ से अच्छा…”।

एक तरफ बेंच रखी है। पूनम, रेशम और प्रतिभा वहाँ आती हैं, हाथ में तिरंगे और चाय के कप।


[प्रवेश]

(पूनम तिरंगे की ओर देख रही है, आवाज़ में गर्व और सवाल दोनों)


पूनम:

"79वाँ स्वतंत्रता दिवस… देखो रेशम, कितनी रौनक है। बच्चे, झंडे, गीत… लेकिन दिल में एक सवाल है—क्या हमारा गणतंत्र वाकई अपने उद्देश्यों में सफल हुआ है?"


रेशम:

"पूनम, यही तो बात है। हमने 1950 में सोचा था—‘गवर्नमेंट ऑफ द पीपल, बाय द पीपल, फॉर द पीपल’। लेकिन आज… ‘for the people’ शब्द कहीं खो गए हैं। हाँ, विकास हुआ है, मगर जहाँ हमें पहुँचना चाहिए था… हम वहाँ नहीं हैं।"


प्रतिभा (थोड़ा तीखे स्वर में):

"सिर्फ नहीं पहुँचे, कई मामलों में पीछे भी हैं। हमारे साथ इज़राइल बना, चारों तरफ से दुश्मन घिरे होने के बावजूद वो शान से खड़ा है। चीन, जो 1949 में नया शासन लाया, अब सुपरपावर बन चुका है। और पाकिस्तान… वो भी कई बार हमसे ज़ोर से अपनी बात रख देता है।"


पूनम:

"हमारी सबसे बड़ी गलती—हमने देश को देश की तरह नहीं देखा। राजनीति संकीर्ण हो गई। हर मुद्दा वोट बैंक से तौला जाने लगा। पूरे समाज के चश्मे से देखने के बजाय 'माइनॉरिटी बनाम मेजॉरिटी' की खिड़की से देखना शुरू किया।"


रेशम:

"और यही कारण है कि 75 साल बाद भी कोई ठोस राष्ट्र नीति नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट नीति तक नहीं। हाल ही में, कश्मीर में फिर से सीमा पार से घुसपैठ की खबर आई, और हम फिर पुराने तरीक़े से ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं।"


प्रतिभा:

"लोकतंत्र के चारों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया—सबकी स्थिति देख लो। न्याय में देरी, संविधान के आदर्शों का क्षरण, आर्थिक विषमता… और ऊपर से भ्रष्टाचार का मकड़जाल। चुनाव में सुधार की बातें होती हैं, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं।"


पूनम:

"और महिलाएँ? देश की आधी आबादी, लेकिन अब भी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। पिछले महीने जो महिला सुरक्षा बिल की चर्चा थी, वो फिर ठंडे बस्ते में चली गई। न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी कि पीड़िता को थक जाना पड़ता है।"


रेशम:

"सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, हमारी युवा पीढ़ी भी। उन्हें राजनीतिक चेतना देने के बजाय, सोशल मीडिया की झूठी चमक-दमक में डुबो दिया गया है। टिकटॉक बैन हुआ तो दूसरे ऐप आ गए, पर असली सवाल—देश के लिए सोचने की आदत—कहाँ है?"


प्रतिभा (दृढ़ आवाज़ में):

"तो हमें करना क्या होगा? हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी पर भाषण सुनकर घर लौट जाएँ? नहीं। अब राजनीति से ऊपर उठकर कुछ स्थायी राष्ट्रीय नीतियाँ बनानी होंगी—विदेश नीति, सुरक्षा नीति, आर्थिक नीति… और सबसे अहम—एक देश, एक सोच।"


पूनम:

"महिला और युवा शक्ति को भी निर्णय लेने में पूरा अवसर देना होगा। अपराध होने पर तुरंत न्याय, और शिक्षा में संस्कारों का समावेश—जिसे आज सांप्रदायिक कहकर दरकिनार किया जाता है।"


रेशम:

"सोच बदलनी होगी। क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनता है। और जब सोच में राष्ट्रप्रेम होगा, तभी गणतंत्र अपने असली अर्थ में सफल होगा।"


[पृष्ठभूमि में बच्चे ‘जन गण मन’ गाना शुरू करते हैं]


प्रतिभा (तिरंगे की ओर देखते हुए, भावुक होकर):

"चाहे करता कोई कितनी निंदा रहे,

चाहे मुक्त हर एक परिंदा रहे।

हम रहें या न रहें फर्क कुछ भी नहीं,

हमारा भारत हमेशा ही जिंदा रहे…"


     तीनों (एक साथ, हाथ में तिरंगा उठाकर):

"हमारा भारत हमेशा ही जिंदा रहे!"


(तिरंगा हवा में लहराता है, बच्चे गीत पूरा करते हैं, और...)


____________&__________

No comments:

Post a Comment