Monday, 18 May 2020

आइये विचार करें, मांसाहार क्यों नहीं?

आइये विचार करें,
मांसाहार क्यों नहीं?

ऐसा हम सबने पढ़ा है कि हमारी भूँख के लिए हमारे शरीर के अंदर की जठराग्नि जिम्मेदार होती
है।यह जितनी प्रबल होती है हमारी भूँख भी उतनी ही प्रबल होती है।उस वक्त हम जैसा भोजन करते हैं वैसा ही हमारा मन और शरीर होता है।
अगर हम अग्नि में मांस डालेंगे तो वहां का दृश्य क्या होगा ,और अगर हम अग्नि में फल, फूल,पत्ते,केसर,आदि डालेंगे तो वहाँ का दृश्य कैसा होगा,यह कल्पना हम स्वयं कर सकते हैं।
अब यह हम खुद तय करें कि हमें अपने शरीर के जठराग्नि रूपी अग्नि में क्या डालकर अपने शरीर को यज्ञशाला बनाना है या श्मशान।
हमें विचार करना चाहिए कि महाराणा प्रताप जंगल में रहकर भी घास की रोटी क्यों खाते थे,वहाँ तो मांस की कोई कमी न थी,,,,,सोचिये?
अपनी प्रकृति को पहचाने ,और उसके अनुकूल रहें।
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Monday, 11 May 2020

व्यथा एक गांव की- हां मैं वही आरोपी हूं

हां मैं वही आरोपी हूं


हां, मैं वही आरोपी हूं
जिस पर ये आरोप है-

यहां रहोगे तो भूखे मर जाओगे।
यहां असभ्यता रहती है,
अशिक्षा रहती है।
यहां जाहिल और गंवार ही रहते हैं।
हां, मैं वही आरोपी हूं।
मुझे छोड़ मेरी ही संतानें,
बड़े-बड़े शहरों में चले गए।
और मैं सिसकता रहा।
किंतु मरा नहीं,
मन में एक आस लिए,
तुम्हारे आने का उल्लास लिए।
निर्निमेष पलकों से,
जोहता हूं बाट तेरा।
शायद तुम आ जाओ!!

ललक ऐसी, देखने की तुझे
नींद भी नहीं आती मुझे।
लेकिन, तुम आते नहीं
शायद सपनों में भी याद करो मुझे।

लेकिन, हाय! जो जहां गया,
वह वहीं का हो गया।
मैं, पूछता हूं तुम सबसे,
मेरी दुर्दशा में तुम्हारा हाथ नहीं है?

अरे! तुम तो कमाने के लिए शहर गए थे...
लेकिन, तुमने हमसे नाता ही तोड़ लिया।
अब तुम मुझे छोड़ शहर के ही हो गए।
लेकिन, मेरा हक कहां, कि तुम्हारी कमाई पर घमंड करूं।

कि, मुझे घर, बड़ा स्कूल बनाना है।
मुझे इंस्टीट्यूट, कॉलेज बनाना है।
मुझे हॉस्पिटल, मॉल बनाना है।
शायद! यह अधिकार केवल शहर को है,
हमें नहीं।
तो मैं कहां जाऊं, मेरा हक, मुझे क्यों न मिले?

लेकिन क्यों आज सभी,
गाड़ी नहीं सैकड़ों मील पैदल,

अकेले नहीं,
बीबी बच्चों के साथ,
खड़ी दुपहरी में गांव आ रहे हैं।

तुम ही कह कर गए थे,
गांव में रहोगे तो भूखों मरोगे।
फिर क्यों चले पैदल ही?
इसीलिए न, अब तुम्हें हुआ विश्वास
सिवाय गांव के, और न कोई आस।
यहां कम से कम जीवन बच जायेगा।
भोजन भी भर पेट मिल जाएगा।

हां, यह सच है, कि गांव किसी को भूखा नहीं मारता।
सबको ही एक दृष्टि से तारता।
हां, आ जाओ मैं तुम्हें भूख से नहीं मरने दूंगा।
हां, आ जाओ मैं तुम्हें भर पेट भोजन दूंगा।
आओ, फिर से मुझे सजाओ।
गोद में मेरी चौपाल लगाओ।
मेरे खेतों में अनाज उगाओ।
खलिहानों में बैठकर फिर आल्हा गाओ।
खुद खाओ, संसार को खिलाओ।
आंगन में चाक के पहिए घुमाओ।
महुआ, पलाश के पत्तों से पत्तल बनाओ।
अपने घर रहकर ही, खुद बचो औरों को बचाओ।
मेरे बाग बगीचे गुलजार करो।
बच्चू, नदी ताल -तलैया तैयार करो।
गोपालक बनो, विकास करो।
आयुध का मत संधान करो।

याद करो बाबा की, दांत पीस- पीस कर देते थे जो गालियां।
याद करो जब बजती थी, सबकी एक साथ वो तालियां।
वो बोरसी वाली आग।
सीताराम दादा के डायलॉग।
आंधी के आम वाली खटाई।
बुजुर्गों के खीझ वाली पिटाई।

प्यार वाली गाली, फूल वाली थाली।
दादी वाली आटे की मिठाई, छूरा घिसता नाई।
मोची की दुकान, मम्मी की पकवान।


सोंधी महक भड़भूजे की,
मीठे स्वाद खरबूजे की।
लाई चना कचौड़ी,
होरहा बूट खेसारी।

पेड़ पर चढ़ता उदबिलाव,
कौवे करते कांव- कांव।
सुबह वाली खिर मिटाव,
गाढ़ी दही का जमाव।
सब तुम्हें बुलाते, जल्दी आओ- जल्दी आओ।

पता है मुझे, वे जरूर आएंगे, जो मुझे चाहेंगे।
जो शहर की चकाचौंध में विलीन हो गए,
वे क्या आएंगे?

वहीँ बना लिए घर, और बसा लिए परिवार।
वहीं से  करते हैं, सारे पर्व और संस्कार।
मुझे बुलाना तो दूर, अब पूछते तक नहीं।
ऐसा लगता है मेरा उन पर कोई अधिकार नहीं।

अधिक नहीं, कम-से-कम होली दीवाली में आ जाते।
मुंडन, जनेऊ, शादी और अंत्येष्टि  मेरी गोद में कर जाते।
जिससे मेरी भोली जनता को, भूखों नहीं मरना होता।
गर उनको जीने हित, रोजगार गांव में चलता होता।
फिर महामारी आने पर, सैकड़ों मील पैदल तो न चलना होता।
गांव में ही रहते सब, तब कितना अच्छा होता।


मैं शहरों की अपेक्षा, उत्तम शिक्षा और संस्कार दे सकता हूं।
मैं बहुतों को यहीं , रोजी रोजगार भी दे सकता हूं।
मैं सबको प्रकृति की गोद में,
जीने का प्रबन्ध भी कर सकता हूं।
मैं तुम्हारे जीवन का, सब तनाव दूर कर सकता हूं।

मैं सब कुछ कर सकता हूं।
बस! तूं समय समय पर आया कर।
दाल रोटी खाया कर।
अशुद्ध आहार से एकदम डर।
नहीं आएगा प्रकृति का कहर।
अपने बीबी बच्चों को मेरी गोद में कर।
फिर तूं हो जा बिल्कुल निडर।

दुनिया की कृत्रिमता को त्याग दे।
अपने सुखों को सब में बाट दे।
फ्रीज नहीं घड़े का पानी पी।
क्रीम नहीं खाओ देशी घी।

शादी या फिर त्योहारों में, पत्तल पर ही खाना खाओ।
गांव में ही रोजगार बढ़ाओ।

गाय का ताजा दूध, खेतों की हरी सब्जी।
अपने मोची के जूते और कपड़ा वाला दर्जी।
हलवाई की मिठाई, बैलों वाली खेती।
दिन भर खेतों में काम, फिर मां की प्यारी गोदी।
खुशहाल हो गांव और खुशहाल हो जिंदगी।
प्रकृति के गोद में ही हम सब की बंदगी।

गांव में ही सच्चा आनंद आएगा।
गांव की सुखों को तू भूल नहीं पाएगा।
मेरे ऊपर का सब आरोप मिट  जाएगा।
हे मेरे लाल! तू सुख ही सुख पाएगा।

गांव में आकर फिर मत करना अत्याचार।
नहीं तो कुदरत की पड़ेगी मार।
शुद्ध शाकाहारी जब जीवन तू बिताएगा,
जीवन का असली सुख चैैैन तब पाएगा।



अब मेरी अर्जी को तुम करो मंजूर।
सदा रहे यश तुम्हारा और खुशी भरपूर।
अब एक बार गांव तुम आओ न जरूर।
अब एक बार गांव तुम आओ न जरूर।

आचार्य गुरुदास प्रजापति (महक जौनपुरी)
9598524752

Sunday, 10 May 2020

धन बरसाती मधुशाला

मंदिर-मस्जिद  बंद कराकर ,
लटका  विद्यालय  पर  ताला !
सरकारों  को  खूब  भा  रही ,
धन  बरसाती  मधुशाला !! 😐
     डिस्टेंसिंग  की  ऐसी तैसी ,
     लाकडाउन  को  धो  डाला !
     भक्तों  के  व्याकुल  हृदयों पर
     रस  बरसाती  मधुशाला ।।                                   😐
बन्द  रहेंगे  मंदिर -मस्ज़िद ,
खुली  रहेंगी  मधुशाला।
ये  कैसे  महामारी  है ,
सोच  रहा  ऊपरवाला।।   😐
नशा  मुक्त  हो  जाता  भारत
तो  कैसे  चलती  मधुशाला
व्यवसाय  रुका  है  उन  गरीबों का,
 जो  नोट  की  जपते  थे माला।।                         😐
नहीं  मिल  रहा  राशन  पानी,
मगर  मिलेगी  मधुशाला।
भाड़  में  जाए  जनता  बेचारी,
दर्द  में  है  पीने  वाला।।     😐
आपत्ति  नहीं  जताओ  कोई,
खुलने  दो  ये  मधुशाला।
कोराना  मुक्त  होगा  भारत,
जब  ठेके  पर  चलेंगे  त्रिशूल और  भाला।।                   😐
मेरी  विनती  है  आप  सभी से,
गर  जाए  कोई  मधुशाला।
वापिस  ना  आने  दो  उसको,
आप   बंद  करो  घर  का ताला।।                             😐
दुनियां   है  बरबाद,
और  इन्हे  चाहिए  मधुशाला।
घर  में  ही  रह लो  पागल लोगो,
ना  बचा  पाएगा  वो रखवाला ।।                                   😐
मंदिर  मस्जिद  बंद  पड़े  हैं,
मगर  खुलेंगी  मधुशाला।
ये  कैसी  महामारी  है,
सोच  रहा  ऊपर  वाला।।  😐
 एक  बोतल   शराब  के लिए,
कतार  मे  जिंदगी  लेकर  खड़ा   हो   गया   अभागा  !!
😢
मौत  का  डर  तो  वहम  था एक ,  आज नशा  हि  जिंदगी  से  बड़ा  हो  गया  !!!                                                      😭   😭
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बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए

बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए


तूफान बन कर आया है कोरोना सब जान जाइए
बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए।
आया है कोरोना सब जान जाइए...

यह तो सत्य सिद्ध है कि फैला मांसाहार से।
क्या होगी तरक्की भाई गोश्त के व्यापार से।
चक्रवृद्धि की तरह बढ़ेगा यह इस बाजार से।
रोकथाम होगा अब शुद्ध शाकाहार से।
दारु बीयर की कमाई कोढ़ है भाई ये।
आया है कोरोना सब जान जाइए।

जीव हिंसा की परंपरा को अब तो मिटाइए।
धर्म भूमि भारत पर अहिंसा को लाइए।
आर्तनाद सुन निरीह जीवों को बचाइए।
जानबूझ कर खुद ही मुसीबत ना बुलाइए।
रक्षक ही होता है महान यह भी जान जाइए।
आया है कोरोना अब तो मान जाइए।


डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट पर अपना ध्यान बढ़ाइए।
कोई शाकाहारी संक्रमित नहीं सबको यह बताइए।
बहुत बड़ा आधार है हृदय में बसाइए।
बंद करो अंडे मांस की दुकान किसी को न चाहिए।
नष्ट हो प्रदूषण नया कीर्तिमान यह बनाइए।
नष्ट हो हिंसा नया कीर्तिमान यह बनाइए।
आया है कोरोनावायरस अब तो मान जाइए...।


उग्र रूप क्रोध से गर्म मिजाज चीज है।
संयम सबके टूट जाएंगे व्यंजन यह गलीज है।
देश के अस्पतालों में अब भरे सब मरीज हैं।
कोई भी मिल ना सके चाहे दिल मिले अजीज हैं।
जिद्द में आवाम ले न, श्मशान जाइए।
आया है...


बुद्धि विवेक होती नाश यही सब का हाल है।
दुष्ट चरित्र गद्दारों का बढ़ने लगा मलाल है।
घर में क्लेश, हिंसा, कलह और बवाल है।
पीने वाला बादशाह किसी की क्या मजाल है।
छोड़कर विदेश अब तो हिंदुस्तान आइए।
आया है कोरोना सब मान जाइए।



जीवात्मा बहुत भ्रमण करके इस शरीर में आई है।
सारी उम्र तूने यूं ही व्यर्थ ही गंवाई है।
अब तो मन को प्रभु शरण में लगाइए।
शिव नेत्र खोलकर भाग्य अपना जगाईए।
घर हीं में रहकर खुद बचिए औरों को बचाइए।
आया है कोरोनावायरस अब तो मान जाइए।


बंद करिए अंडा मांस मछली और शराब।
इनसे बहुत होती है बुद्धि भी खराब।
जवानी की आड़ में अहंकार न दिखाइए।
बुद्धिमानी की आड़ में अहंकार न दिखाइए।
आया है कोरोनावायरस अब सब जान जाइए।
तूफान है क़ोरोना यह सब जान जाइए।
बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए।


आचार्य गुरुदास प्रजापति (महक)
9598524752
Kunwarraj52@gmail.com