Friday, 15 August 2025

आजादी की अनुभूति'



*विधा-गीत*


*शीर्षक- "आज़ादी की अनुभूति"*


सुनहरी सुबह का सपना, अभी अधूरा-सा क्यों है?

धरती तो अपनी हो गई, मन पर पहरा क्यों है?

भीड़ है राहों में फिर भी, दिल अकेला रोता है,

आज़ादी की अनुभूति, अब भी कहीं खोता है…॥


मुट्ठी में इतिहास थामे, चल दिए हम दूर तक,

पर सपनों के गांव में, पहुंचे ही नहीं आज तक।

रोटी के संग सम्मान का, स्वाद कब हम पाएंगे?

सच्ची आज़ादी के सूरज, कब नभ में छाएंगे…?॥


जाति-धर्म की दीवारें, क्यों अभी भी ऊँची हैं?

अंधी दौड़ में नैतिकता, क्यों पीछे छूटी है?

शब्द तो आज़ाद हैं लेकिन, सोच कैदखानों में,

सपनों के दीपक जलते हैं, आंसू के ठिकानों में…॥


फिर भी उम्मीद का पंछी, उड़े न थकने पाएगा,

हर पीढ़ी एक नया सवेरा, आकाश में लाएगा।

पर सवाल मन में गूंजे, जैसे कोई तान पूरा—

आज़ादी की अनुभूति, होगी कब सच में पूरा…?॥


©गुरुदास प्रजापति 'राज़'

भारतीय स्वाधीनता- मंजिल अब भी दूर है?


विधा - *संवाद* (नाटकीय झलक लिए)


*शीर्षक: भारतीय स्वाधीनता– मंज़िल अब भी दूर?*

लेखक: आचार्य गुरुदास प्रजापति


दृश्य:


पार्क में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव चल रहा है। मंच के एक ओर तिरंगा फहरा रहा है, बच्चों का झुंड देशभक्ति गीत गा रहा है – “सारे जहाँ से अच्छा…”।

एक तरफ बेंच रखी है। पूनम, रेशम और प्रतिभा वहाँ आती हैं, हाथ में तिरंगे और चाय के कप।


[प्रवेश]

(पूनम तिरंगे की ओर देख रही है, आवाज़ में गर्व और सवाल दोनों)


पूनम:

"79वाँ स्वतंत्रता दिवस… देखो रेशम, कितनी रौनक है। बच्चे, झंडे, गीत… लेकिन दिल में एक सवाल है—क्या हमारा गणतंत्र वाकई अपने उद्देश्यों में सफल हुआ है?"


रेशम:

"पूनम, यही तो बात है। हमने 1950 में सोचा था—‘गवर्नमेंट ऑफ द पीपल, बाय द पीपल, फॉर द पीपल’। लेकिन आज… ‘for the people’ शब्द कहीं खो गए हैं। हाँ, विकास हुआ है, मगर जहाँ हमें पहुँचना चाहिए था… हम वहाँ नहीं हैं।"


प्रतिभा (थोड़ा तीखे स्वर में):

"सिर्फ नहीं पहुँचे, कई मामलों में पीछे भी हैं। हमारे साथ इज़राइल बना, चारों तरफ से दुश्मन घिरे होने के बावजूद वो शान से खड़ा है। चीन, जो 1949 में नया शासन लाया, अब सुपरपावर बन चुका है। और पाकिस्तान… वो भी कई बार हमसे ज़ोर से अपनी बात रख देता है।"


पूनम:

"हमारी सबसे बड़ी गलती—हमने देश को देश की तरह नहीं देखा। राजनीति संकीर्ण हो गई। हर मुद्दा वोट बैंक से तौला जाने लगा। पूरे समाज के चश्मे से देखने के बजाय 'माइनॉरिटी बनाम मेजॉरिटी' की खिड़की से देखना शुरू किया।"


रेशम:

"और यही कारण है कि 75 साल बाद भी कोई ठोस राष्ट्र नीति नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट नीति तक नहीं। हाल ही में, कश्मीर में फिर से सीमा पार से घुसपैठ की खबर आई, और हम फिर पुराने तरीक़े से ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं।"


प्रतिभा:

"लोकतंत्र के चारों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया—सबकी स्थिति देख लो। न्याय में देरी, संविधान के आदर्शों का क्षरण, आर्थिक विषमता… और ऊपर से भ्रष्टाचार का मकड़जाल। चुनाव में सुधार की बातें होती हैं, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं।"


पूनम:

"और महिलाएँ? देश की आधी आबादी, लेकिन अब भी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। पिछले महीने जो महिला सुरक्षा बिल की चर्चा थी, वो फिर ठंडे बस्ते में चली गई। न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी कि पीड़िता को थक जाना पड़ता है।"


रेशम:

"सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, हमारी युवा पीढ़ी भी। उन्हें राजनीतिक चेतना देने के बजाय, सोशल मीडिया की झूठी चमक-दमक में डुबो दिया गया है। टिकटॉक बैन हुआ तो दूसरे ऐप आ गए, पर असली सवाल—देश के लिए सोचने की आदत—कहाँ है?"


प्रतिभा (दृढ़ आवाज़ में):

"तो हमें करना क्या होगा? हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी पर भाषण सुनकर घर लौट जाएँ? नहीं। अब राजनीति से ऊपर उठकर कुछ स्थायी राष्ट्रीय नीतियाँ बनानी होंगी—विदेश नीति, सुरक्षा नीति, आर्थिक नीति… और सबसे अहम—एक देश, एक सोच।"


पूनम:

"महिला और युवा शक्ति को भी निर्णय लेने में पूरा अवसर देना होगा। अपराध होने पर तुरंत न्याय, और शिक्षा में संस्कारों का समावेश—जिसे आज सांप्रदायिक कहकर दरकिनार किया जाता है।"


रेशम:

"सोच बदलनी होगी। क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनता है। और जब सोच में राष्ट्रप्रेम होगा, तभी गणतंत्र अपने असली अर्थ में सफल होगा।"


[पृष्ठभूमि में बच्चे ‘जन गण मन’ गाना शुरू करते हैं]


प्रतिभा (तिरंगे की ओर देखते हुए, भावुक होकर):

"चाहे करता कोई कितनी निंदा रहे,

चाहे मुक्त हर एक परिंदा रहे।

हम रहें या न रहें फर्क कुछ भी नहीं,

हमारा भारत हमेशा ही जिंदा रहे…"


     तीनों (एक साथ, हाथ में तिरंगा उठाकर):

"हमारा भारत हमेशा ही जिंदा रहे!"


(तिरंगा हवा में लहराता है, बच्चे गीत पूरा करते हैं, और...)


____________&__________

स्वतंत्रता का सही अर्थ

 *स्वतंत्रता का सही अर्थ*


     भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली—यह तिथि इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है। किंतु क्या वास्तव में यही स्वतंत्रता का सही अर्थ है? या यह केवल एक राजनैतिक परिवर्तन था, जिसमें शासक अंग्रेज से भारतीय बन गए, पर व्यवस्था, सोच, और उद्देश्यों में कोई बुनियादी बदलाव न आया? जब हम "स्वतंत्रता" शब्द का अर्थ समझने का प्रयास करते हैं, तो पाते हैं कि यह केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि भीतर की जड़ताओं, भय, और असमानताओं से छुटकारा भी है। यदि ये जड़ताएँ बनी रहें, तो स्वतंत्रता केवल आधी, अधूरी और लक्ष्यहीन रह जाती है।


     भारत की आज़ादी का अर्थ था—गरीबी का अंत, अशिक्षा का उन्मूलन, जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव की समाप्ति, और हर नागरिक को समान अवसर। परंतु वास्तविकता यह है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राजनीति में भ्रष्टाचार, प्रशासन में अकुशलता और समाज में व्याप्त असमानता यह सिद्ध करती है कि स्वतंत्रता का लक्ष्य अधूरा है। हम राजनीतिक रूप से तो आज़ाद हैं, पर आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से अभी भी बंधन में जकड़े हैं।


     स्वतंत्रता के बाद किसी राष्ट्र के पास स्पष्ट और दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए—जैसे, शिक्षा में आत्मनिर्भरता, विज्ञान और तकनीक में अग्रणी बनना, या एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना। दुर्भाग्यवश, भारत की स्वतंत्रता के बाद की यात्रा में ऐसा कोई ठोस, सर्वमान्य और स्थिर लक्ष्य नहीं दिखाई देता। शासन बदलते ही नीतियाँ बदल जाती हैं, योजनाएँ अधूरी रह जाती हैं, और देश की ऊर्जा दिशा-हीन हो जाती है। परिणामस्वरूप, स्वतंत्रता का उत्सव तो मनाया जाता है, पर इसकी सार्थकता का निर्माण नहीं हो पाता।


     आज का राजनीतिक परिदृश्य यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता का उपयोग राष्ट्रीय उत्थान की बजाय राजनीतिक स्वार्थ साधने में अधिक हुआ है। चुनावी रैलियों में विकास के बजाय जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण पर जोर दिया जाता है। जनता को जागरूक नागरिक बनाने के बजाय उन्हें वोट बैंक के रूप में देखा जाता है। यदि स्वतंत्रता का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित रह जाए, तो वह अपने मर्म को खो देती है।


    सच्ची स्वतंत्रता केवल राजनीतिक ढांचे में बदलाव से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब हर व्यक्ति अपने भय, अज्ञान और अन्याय से मुक्त हो। यह स्वतंत्रता तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें और उनका पालन करें। यदि हम केवल अधिकारों की मांग करें और कर्तव्यों को भूल जाएं, तो स्वतंत्रता का संतुलन बिगड़ जाता है।


     महात्मा गांधी ने कहा था— "स्वतंत्रता बाहरी नहीं, आंतरिक भी होनी चाहिए।" जब तक व्यक्ति लोभ, क्रोध, घृणा और स्वार्थ की जंजीरों में जकड़ा रहेगा, तब तक राष्ट्र भी इन अदृश्य बंधनों से मुक्त नहीं हो पाएगा। दुर्भाग्य यह है कि आज हमारा समाज उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में उलझा है, जहां नैतिकता और मानवीयता पीछे छूट गई हैं।


      फिर भी, आशा की किरण मौजूद है। भारत के पास विशाल युवा शक्ति, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और असीम प्राकृतिक संसाधन हैं। यदि हम शिक्षा को प्राथमिकता दें, विज्ञान और तकनीक में निवेश करें, तथा ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाएं, तो हम न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से भी स्वतंत्र हो सकते हैं। यह तभी संभव है जब हम स्वतंत्रता को केवल ‘स्वतंत्र होने’ के रूप में न देखें, बल्कि इसे ‘सार्थक बनाने’ का प्रयास करें। हमारी हमेशा यही कामना रहती है - 

*रहो खुश मेरे हिंदुस्तान*

          *तुम्हारा पथ हो मंगल मूल*

*सदा महके बन चंदन चारु*

          *तुम्हारी अंगनाई की धूल*


*निष्कर्ष*

     स्वतंत्रता का सही अर्थ केवल यह नहीं कि हमारे ऊपर कोई विदेशी शासन न हो, बल्कि यह है कि हर नागरिक गरिमा, समानता और अवसर के साथ जीवन जी सके। आज, जब हम स्वतंत्रता का जश्न मनाते हैं, तो यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमारी स्वतंत्रता सचमुच पूर्ण है? क्या हमने इसका सही अर्थ समझ लिया है, या हम अब भी उसकी खोज में हैं…?


-  *गुरुदास प्रजापति 'राज'* ©

प्रख्यात लेखक एवं विशेषज्ञ 

Monday, 18 May 2020

आइये विचार करें, मांसाहार क्यों नहीं?

आइये विचार करें,
मांसाहार क्यों नहीं?

ऐसा हम सबने पढ़ा है कि हमारी भूँख के लिए हमारे शरीर के अंदर की जठराग्नि जिम्मेदार होती
है।यह जितनी प्रबल होती है हमारी भूँख भी उतनी ही प्रबल होती है।उस वक्त हम जैसा भोजन करते हैं वैसा ही हमारा मन और शरीर होता है।
अगर हम अग्नि में मांस डालेंगे तो वहां का दृश्य क्या होगा ,और अगर हम अग्नि में फल, फूल,पत्ते,केसर,आदि डालेंगे तो वहाँ का दृश्य कैसा होगा,यह कल्पना हम स्वयं कर सकते हैं।
अब यह हम खुद तय करें कि हमें अपने शरीर के जठराग्नि रूपी अग्नि में क्या डालकर अपने शरीर को यज्ञशाला बनाना है या श्मशान।
हमें विचार करना चाहिए कि महाराणा प्रताप जंगल में रहकर भी घास की रोटी क्यों खाते थे,वहाँ तो मांस की कोई कमी न थी,,,,,सोचिये?
अपनी प्रकृति को पहचाने ,और उसके अनुकूल रहें।
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Monday, 11 May 2020

व्यथा एक गांव की- हां मैं वही आरोपी हूं

हां मैं वही आरोपी हूं


हां, मैं वही आरोपी हूं
जिस पर ये आरोप है-

यहां रहोगे तो भूखे मर जाओगे।
यहां असभ्यता रहती है,
अशिक्षा रहती है।
यहां जाहिल और गंवार ही रहते हैं।
हां, मैं वही आरोपी हूं।
मुझे छोड़ मेरी ही संतानें,
बड़े-बड़े शहरों में चले गए।
और मैं सिसकता रहा।
किंतु मरा नहीं,
मन में एक आस लिए,
तुम्हारे आने का उल्लास लिए।
निर्निमेष पलकों से,
जोहता हूं बाट तेरा।
शायद तुम आ जाओ!!

ललक ऐसी, देखने की तुझे
नींद भी नहीं आती मुझे।
लेकिन, तुम आते नहीं
शायद सपनों में भी याद करो मुझे।

लेकिन, हाय! जो जहां गया,
वह वहीं का हो गया।
मैं, पूछता हूं तुम सबसे,
मेरी दुर्दशा में तुम्हारा हाथ नहीं है?

अरे! तुम तो कमाने के लिए शहर गए थे...
लेकिन, तुमने हमसे नाता ही तोड़ लिया।
अब तुम मुझे छोड़ शहर के ही हो गए।
लेकिन, मेरा हक कहां, कि तुम्हारी कमाई पर घमंड करूं।

कि, मुझे घर, बड़ा स्कूल बनाना है।
मुझे इंस्टीट्यूट, कॉलेज बनाना है।
मुझे हॉस्पिटल, मॉल बनाना है।
शायद! यह अधिकार केवल शहर को है,
हमें नहीं।
तो मैं कहां जाऊं, मेरा हक, मुझे क्यों न मिले?

लेकिन क्यों आज सभी,
गाड़ी नहीं सैकड़ों मील पैदल,

अकेले नहीं,
बीबी बच्चों के साथ,
खड़ी दुपहरी में गांव आ रहे हैं।

तुम ही कह कर गए थे,
गांव में रहोगे तो भूखों मरोगे।
फिर क्यों चले पैदल ही?
इसीलिए न, अब तुम्हें हुआ विश्वास
सिवाय गांव के, और न कोई आस।
यहां कम से कम जीवन बच जायेगा।
भोजन भी भर पेट मिल जाएगा।

हां, यह सच है, कि गांव किसी को भूखा नहीं मारता।
सबको ही एक दृष्टि से तारता।
हां, आ जाओ मैं तुम्हें भूख से नहीं मरने दूंगा।
हां, आ जाओ मैं तुम्हें भर पेट भोजन दूंगा।
आओ, फिर से मुझे सजाओ।
गोद में मेरी चौपाल लगाओ।
मेरे खेतों में अनाज उगाओ।
खलिहानों में बैठकर फिर आल्हा गाओ।
खुद खाओ, संसार को खिलाओ।
आंगन में चाक के पहिए घुमाओ।
महुआ, पलाश के पत्तों से पत्तल बनाओ।
अपने घर रहकर ही, खुद बचो औरों को बचाओ।
मेरे बाग बगीचे गुलजार करो।
बच्चू, नदी ताल -तलैया तैयार करो।
गोपालक बनो, विकास करो।
आयुध का मत संधान करो।

याद करो बाबा की, दांत पीस- पीस कर देते थे जो गालियां।
याद करो जब बजती थी, सबकी एक साथ वो तालियां।
वो बोरसी वाली आग।
सीताराम दादा के डायलॉग।
आंधी के आम वाली खटाई।
बुजुर्गों के खीझ वाली पिटाई।

प्यार वाली गाली, फूल वाली थाली।
दादी वाली आटे की मिठाई, छूरा घिसता नाई।
मोची की दुकान, मम्मी की पकवान।


सोंधी महक भड़भूजे की,
मीठे स्वाद खरबूजे की।
लाई चना कचौड़ी,
होरहा बूट खेसारी।

पेड़ पर चढ़ता उदबिलाव,
कौवे करते कांव- कांव।
सुबह वाली खिर मिटाव,
गाढ़ी दही का जमाव।
सब तुम्हें बुलाते, जल्दी आओ- जल्दी आओ।

पता है मुझे, वे जरूर आएंगे, जो मुझे चाहेंगे।
जो शहर की चकाचौंध में विलीन हो गए,
वे क्या आएंगे?

वहीँ बना लिए घर, और बसा लिए परिवार।
वहीं से  करते हैं, सारे पर्व और संस्कार।
मुझे बुलाना तो दूर, अब पूछते तक नहीं।
ऐसा लगता है मेरा उन पर कोई अधिकार नहीं।

अधिक नहीं, कम-से-कम होली दीवाली में आ जाते।
मुंडन, जनेऊ, शादी और अंत्येष्टि  मेरी गोद में कर जाते।
जिससे मेरी भोली जनता को, भूखों नहीं मरना होता।
गर उनको जीने हित, रोजगार गांव में चलता होता।
फिर महामारी आने पर, सैकड़ों मील पैदल तो न चलना होता।
गांव में ही रहते सब, तब कितना अच्छा होता।


मैं शहरों की अपेक्षा, उत्तम शिक्षा और संस्कार दे सकता हूं।
मैं बहुतों को यहीं , रोजी रोजगार भी दे सकता हूं।
मैं सबको प्रकृति की गोद में,
जीने का प्रबन्ध भी कर सकता हूं।
मैं तुम्हारे जीवन का, सब तनाव दूर कर सकता हूं।

मैं सब कुछ कर सकता हूं।
बस! तूं समय समय पर आया कर।
दाल रोटी खाया कर।
अशुद्ध आहार से एकदम डर।
नहीं आएगा प्रकृति का कहर।
अपने बीबी बच्चों को मेरी गोद में कर।
फिर तूं हो जा बिल्कुल निडर।

दुनिया की कृत्रिमता को त्याग दे।
अपने सुखों को सब में बाट दे।
फ्रीज नहीं घड़े का पानी पी।
क्रीम नहीं खाओ देशी घी।

शादी या फिर त्योहारों में, पत्तल पर ही खाना खाओ।
गांव में ही रोजगार बढ़ाओ।

गाय का ताजा दूध, खेतों की हरी सब्जी।
अपने मोची के जूते और कपड़ा वाला दर्जी।
हलवाई की मिठाई, बैलों वाली खेती।
दिन भर खेतों में काम, फिर मां की प्यारी गोदी।
खुशहाल हो गांव और खुशहाल हो जिंदगी।
प्रकृति के गोद में ही हम सब की बंदगी।

गांव में ही सच्चा आनंद आएगा।
गांव की सुखों को तू भूल नहीं पाएगा।
मेरे ऊपर का सब आरोप मिट  जाएगा।
हे मेरे लाल! तू सुख ही सुख पाएगा।

गांव में आकर फिर मत करना अत्याचार।
नहीं तो कुदरत की पड़ेगी मार।
शुद्ध शाकाहारी जब जीवन तू बिताएगा,
जीवन का असली सुख चैैैन तब पाएगा।



अब मेरी अर्जी को तुम करो मंजूर।
सदा रहे यश तुम्हारा और खुशी भरपूर।
अब एक बार गांव तुम आओ न जरूर।
अब एक बार गांव तुम आओ न जरूर।

आचार्य गुरुदास प्रजापति (महक जौनपुरी)
9598524752

Sunday, 10 May 2020

धन बरसाती मधुशाला

मंदिर-मस्जिद  बंद कराकर ,
लटका  विद्यालय  पर  ताला !
सरकारों  को  खूब  भा  रही ,
धन  बरसाती  मधुशाला !! 😐
     डिस्टेंसिंग  की  ऐसी तैसी ,
     लाकडाउन  को  धो  डाला !
     भक्तों  के  व्याकुल  हृदयों पर
     रस  बरसाती  मधुशाला ।।                                   😐
बन्द  रहेंगे  मंदिर -मस्ज़िद ,
खुली  रहेंगी  मधुशाला।
ये  कैसे  महामारी  है ,
सोच  रहा  ऊपरवाला।।   😐
नशा  मुक्त  हो  जाता  भारत
तो  कैसे  चलती  मधुशाला
व्यवसाय  रुका  है  उन  गरीबों का,
 जो  नोट  की  जपते  थे माला।।                         😐
नहीं  मिल  रहा  राशन  पानी,
मगर  मिलेगी  मधुशाला।
भाड़  में  जाए  जनता  बेचारी,
दर्द  में  है  पीने  वाला।।     😐
आपत्ति  नहीं  जताओ  कोई,
खुलने  दो  ये  मधुशाला।
कोराना  मुक्त  होगा  भारत,
जब  ठेके  पर  चलेंगे  त्रिशूल और  भाला।।                   😐
मेरी  विनती  है  आप  सभी से,
गर  जाए  कोई  मधुशाला।
वापिस  ना  आने  दो  उसको,
आप   बंद  करो  घर  का ताला।।                             😐
दुनियां   है  बरबाद,
और  इन्हे  चाहिए  मधुशाला।
घर  में  ही  रह लो  पागल लोगो,
ना  बचा  पाएगा  वो रखवाला ।।                                   😐
मंदिर  मस्जिद  बंद  पड़े  हैं,
मगर  खुलेंगी  मधुशाला।
ये  कैसी  महामारी  है,
सोच  रहा  ऊपर  वाला।।  😐
 एक  बोतल   शराब  के लिए,
कतार  मे  जिंदगी  लेकर  खड़ा   हो   गया   अभागा  !!
😢
मौत  का  डर  तो  वहम  था एक ,  आज नशा  हि  जिंदगी  से  बड़ा  हो  गया  !!!                                                      😭   😭
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बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए

बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए


तूफान बन कर आया है कोरोना सब जान जाइए
बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए।
आया है कोरोना सब जान जाइए...

यह तो सत्य सिद्ध है कि फैला मांसाहार से।
क्या होगी तरक्की भाई गोश्त के व्यापार से।
चक्रवृद्धि की तरह बढ़ेगा यह इस बाजार से।
रोकथाम होगा अब शुद्ध शाकाहार से।
दारु बीयर की कमाई कोढ़ है भाई ये।
आया है कोरोना सब जान जाइए।

जीव हिंसा की परंपरा को अब तो मिटाइए।
धर्म भूमि भारत पर अहिंसा को लाइए।
आर्तनाद सुन निरीह जीवों को बचाइए।
जानबूझ कर खुद ही मुसीबत ना बुलाइए।
रक्षक ही होता है महान यह भी जान जाइए।
आया है कोरोना अब तो मान जाइए।


डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट पर अपना ध्यान बढ़ाइए।
कोई शाकाहारी संक्रमित नहीं सबको यह बताइए।
बहुत बड़ा आधार है हृदय में बसाइए।
बंद करो अंडे मांस की दुकान किसी को न चाहिए।
नष्ट हो प्रदूषण नया कीर्तिमान यह बनाइए।
नष्ट हो हिंसा नया कीर्तिमान यह बनाइए।
आया है कोरोनावायरस अब तो मान जाइए...।


उग्र रूप क्रोध से गर्म मिजाज चीज है।
संयम सबके टूट जाएंगे व्यंजन यह गलीज है।
देश के अस्पतालों में अब भरे सब मरीज हैं।
कोई भी मिल ना सके चाहे दिल मिले अजीज हैं।
जिद्द में आवाम ले न, श्मशान जाइए।
आया है...


बुद्धि विवेक होती नाश यही सब का हाल है।
दुष्ट चरित्र गद्दारों का बढ़ने लगा मलाल है।
घर में क्लेश, हिंसा, कलह और बवाल है।
पीने वाला बादशाह किसी की क्या मजाल है।
छोड़कर विदेश अब तो हिंदुस्तान आइए।
आया है कोरोना सब मान जाइए।



जीवात्मा बहुत भ्रमण करके इस शरीर में आई है।
सारी उम्र तूने यूं ही व्यर्थ ही गंवाई है।
अब तो मन को प्रभु शरण में लगाइए।
शिव नेत्र खोलकर भाग्य अपना जगाईए।
घर हीं में रहकर खुद बचिए औरों को बचाइए।
आया है कोरोनावायरस अब तो मान जाइए।


बंद करिए अंडा मांस मछली और शराब।
इनसे बहुत होती है बुद्धि भी खराब।
जवानी की आड़ में अहंकार न दिखाइए।
बुद्धिमानी की आड़ में अहंकार न दिखाइए।
आया है कोरोनावायरस अब सब जान जाइए।
तूफान है क़ोरोना यह सब जान जाइए।
बंद करिए बीयर की दुकान अब तो मान जाइए।


आचार्य गुरुदास प्रजापति (महक)
9598524752
Kunwarraj52@gmail.com