व्यथा एक गांव की- हां मैं वही आरोपी हूं
हां मैं वही आरोपी हूं
हां, मैं वही आरोपी हूं
जिस पर ये आरोप है-
यहां रहोगे तो भूखे मर जाओगे।
यहां असभ्यता रहती है,
अशिक्षा रहती है।
यहां जाहिल और गंवार ही रहते हैं।
हां, मैं वही आरोपी हूं।
मुझे छोड़ मेरी ही संतानें,
बड़े-बड़े शहरों में चले गए।
और मैं सिसकता रहा।
किंतु मरा नहीं,
मन में एक आस लिए,
तुम्हारे आने का उल्लास लिए।
निर्निमेष पलकों से,
जोहता हूं बाट तेरा।
शायद तुम आ जाओ!!
ललक ऐसी, देखने की तुझे
नींद भी नहीं आती मुझे।
लेकिन, तुम आते नहीं
शायद सपनों में भी याद करो मुझे।
लेकिन, हाय! जो जहां गया,
वह वहीं का हो गया।
मैं, पूछता हूं तुम सबसे,
मेरी दुर्दशा में तुम्हारा हाथ नहीं है?
अरे! तुम तो कमाने के लिए शहर गए थे...
लेकिन, तुमने हमसे नाता ही तोड़ लिया।
अब तुम मुझे छोड़ शहर के ही हो गए।
लेकिन, मेरा हक कहां, कि तुम्हारी कमाई पर घमंड करूं।
कि, मुझे घर, बड़ा स्कूल बनाना है।
मुझे इंस्टीट्यूट, कॉलेज बनाना है।
मुझे हॉस्पिटल, मॉल बनाना है।
शायद! यह अधिकार केवल शहर को है,
हमें नहीं।
तो मैं कहां जाऊं, मेरा हक, मुझे क्यों न मिले?
लेकिन क्यों आज सभी,
गाड़ी नहीं सैकड़ों मील पैदल,

अकेले नहीं,
बीबी बच्चों के साथ,
खड़ी दुपहरी में गांव आ रहे हैं।
तुम ही कह कर गए थे,
गांव में रहोगे तो भूखों मरोगे।
फिर क्यों चले पैदल ही?
इसीलिए न, अब तुम्हें हुआ विश्वास
सिवाय गांव के, और न कोई आस।
यहां कम से कम जीवन बच जायेगा।
भोजन भी भर पेट मिल जाएगा।
हां, यह सच है, कि गांव किसी को भूखा नहीं मारता।
सबको ही एक दृष्टि से तारता।
हां, आ जाओ मैं तुम्हें भूख से नहीं मरने दूंगा।
हां, आ जाओ मैं तुम्हें भर पेट भोजन दूंगा।
आओ, फिर से मुझे सजाओ।
गोद में मेरी चौपाल लगाओ।
मेरे खेतों में अनाज उगाओ।
खलिहानों में बैठकर फिर आल्हा गाओ।
खुद खाओ, संसार को खिलाओ।
आंगन में चाक के पहिए घुमाओ।
महुआ, पलाश के पत्तों से पत्तल बनाओ।
अपने घर रहकर ही, खुद बचो औरों को बचाओ।
मेरे बाग बगीचे गुलजार करो।
बच्चू, नदी ताल -तलैया तैयार करो।
गोपालक बनो, विकास करो।
आयुध का मत संधान करो।
याद करो बाबा की, दांत पीस- पीस कर देते थे जो गालियां।
याद करो जब बजती थी, सबकी एक साथ वो तालियां।
वो बोरसी वाली आग।
सीताराम दादा के डायलॉग।
आंधी के आम वाली खटाई।
बुजुर्गों के खीझ वाली पिटाई।
प्यार वाली गाली, फूल वाली थाली।
दादी वाली आटे की मिठाई, छूरा घिसता नाई।
मोची की दुकान, मम्मी की पकवान।
सोंधी महक भड़भूजे की,
मीठे स्वाद खरबूजे की।
लाई चना कचौड़ी,
होरहा बूट खेसारी।
पेड़ पर चढ़ता उदबिलाव,
कौवे करते कांव- कांव।
सुबह वाली खिर मिटाव,
गाढ़ी दही का जमाव।
सब तुम्हें बुलाते, जल्दी आओ- जल्दी आओ।
पता है मुझे, वे जरूर आएंगे, जो मुझे चाहेंगे।
जो शहर की चकाचौंध में विलीन हो गए,
वे क्या आएंगे?
वहीँ बना लिए घर, और बसा लिए परिवार।
वहीं से करते हैं, सारे पर्व और संस्कार।
मुझे बुलाना तो दूर, अब पूछते तक नहीं।
ऐसा लगता है मेरा उन पर कोई अधिकार नहीं।
अधिक नहीं, कम-से-कम होली दीवाली में आ जाते।
मुंडन, जनेऊ, शादी और अंत्येष्टि मेरी गोद में कर जाते।
जिससे मेरी भोली जनता को, भूखों नहीं मरना होता।
गर उनको जीने हित, रोजगार गांव में चलता होता।
फिर महामारी आने पर, सैकड़ों मील पैदल तो न चलना होता।
गांव में ही रहते सब, तब कितना अच्छा होता।
मैं शहरों की अपेक्षा, उत्तम शिक्षा और संस्कार दे सकता हूं।
मैं बहुतों को यहीं , रोजी रोजगार भी दे सकता हूं।
मैं सबको प्रकृति की गोद में,
जीने का प्रबन्ध भी कर सकता हूं।
मैं तुम्हारे जीवन का, सब तनाव दूर कर सकता हूं।
मैं सब कुछ कर सकता हूं।
बस! तूं समय समय पर आया कर।
दाल रोटी खाया कर।
अशुद्ध आहार से एकदम डर।
नहीं आएगा प्रकृति का कहर।
अपने बीबी बच्चों को मेरी गोद में कर।
फिर तूं हो जा बिल्कुल निडर।
दुनिया की कृत्रिमता को त्याग दे।
अपने सुखों को सब में बाट दे।
फ्रीज नहीं घड़े का पानी पी।
क्रीम नहीं खाओ देशी घी।
शादी या फिर त्योहारों में, पत्तल पर ही खाना खाओ।
गांव में ही रोजगार बढ़ाओ।
गाय का ताजा दूध, खेतों की हरी सब्जी।
अपने मोची के जूते और कपड़ा वाला दर्जी।
हलवाई की मिठाई, बैलों वाली खेती।
दिन भर खेतों में काम, फिर मां की प्यारी गोदी।
खुशहाल हो गांव और खुशहाल हो जिंदगी।
प्रकृति के गोद में ही हम सब की बंदगी।
गांव में ही सच्चा आनंद आएगा।
गांव की सुखों को तू भूल नहीं पाएगा।
मेरे ऊपर का सब आरोप मिट जाएगा।
हे मेरे लाल! तू सुख ही सुख पाएगा।
गांव में आकर फिर मत करना अत्याचार।
नहीं तो कुदरत की पड़ेगी मार।
शुद्ध शाकाहारी जब जीवन तू बिताएगा,
जीवन का असली सुख चैैैन तब पाएगा।
अब मेरी अर्जी को तुम करो मंजूर।
सदा रहे यश तुम्हारा और खुशी भरपूर।
अब एक बार गांव तुम आओ न जरूर।
अब एक बार गांव तुम आओ न जरूर।
आचार्य गुरुदास प्रजापति (महक जौनपुरी)
9598524752
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